होली में इस पेड़ से होती है मोतियों की वर्षा

ब्रज के कण-कण में राधा और कृष्ण बसे हुए हैं। उनकी लीलाओं के सबूत भी ब्रज में देखने को मिलते रहते हैं। आपका अगर कान्हा पर विश्वास है तो आप इन कथाओं पर जरूर विश्वास करते होंगे, लेकिन कहते हैं ना कि ये विश्वास भी आस्था के साथ जुड़े होते हैं वरना कई लोग तो इनको महज भ्रम या छलावा मात्र मानते हैं। आज हम आपको राधा और कृष्ण की लीला से जुड़ी एक ऐसी ही मान्यता के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर आज के वक्त में भी पेड़ से होली के मौके पर मोती झड़ते हैं। वहीं इन मोतियों को बटोरने के लिए काफी दूर-दूर से लोग आते हैं।

बताया जाता है कि होली के मौके पर यहां भक्तों का तांता लग जाता है। लोग इस जगह को देखने तक के लिए दूर-दूर से आते हैं। माना आपको हमारी बातों पर यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन ये एक सच्ची मान्यता है जिसे ब्रज के लोग मानते हैं। पुराणों के मुताबिक कहानी ये है कि गोवर्धन पर्वत को उठाने के कुछ समय बाद ही राधा और कृष्ण की सगाई हो गई थी। उस वक्त राधा जी के पिता ने कृष्ण को मोती दिए थे। बताते हैं कि उस मोती को कृष्ण ने कुंड के पास जमीन में बो दिया था। तब वहां पर उन मोतियों का एक पेड़ उग आया। जिससे होली के मौके पर मोती झड़ते हैं।

जिस पर ये मोती लगते हैं वो डोगर यानि कि पीलू का पेड़ है। वैसे तो पूरे ब्रज में कुछ ही जगह पर ये पेड़ हैं, लेकिन ये मोती फल सिर्फ मोती कुंड के पास मौजूद पेड़ पर ही मिलते हैं। ब्रज की 84 कोस की यात्रा के दौरान मोती बटोरने आए लोग बताते हैं कि ये कृष्ण की माया है। वैसे आप ये भी सोच रहे होंगे कि राधा और कृष्ण के सगाई का वर्णन आज तक आपने कहीं नहीं सुना है तो ये नई कहानी कहां से आई। बरसाने के एक विरक्‍त संत रमेश बाबा के अनुसार भगवान कृष्‍ण और राधा के सांसारिक रिश्‍ते बेशक नहीं रहे हों, लेकिन गौतमी तंत्र और गर्ग संहिता समेत कई ग्रंथों में इस महान मोती कुंड और राधा-कृष्‍ण की सगाई का वर्णन मिलता है। गर्ग संहिता के मुताबिक बारिश के यानि कि इंद्र देवता के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए जब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था उसके बाद राधा के पिता ने राधा और कृष्ण की सगाई कर दी थी। जिसकू वजह से राधा के पिता ने उन्हें कीमती मोती दिए थे।

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राधा के पिता के दिए कीमती मोतियों को देखने के बाद नंद बाबा को चिंता सताने लगी कि वह इन मोतियों को कहां और कैसे रखेंगे। जिसके बाद श्रीकृष्ण उन मोतियों को यशोदा मैय्या से लेकर गये और कुंड के पास मोतियों को बो दिया। इसकी खबर जब नंद बाबा को लगी तो उन्होंने श्री कृष्ण पर काफी गुस्सा किया और मोतियों को निकालने के लिए लोगों को भेजा, लेकिन लोगों को वहां पहुंचकर जो देखने को मिला उसे देखकर सब हैरान थे। वहां पर उन मोतियों के पेड़ उग आए थे। जिन पर मोती लटके हुए थे। जिनको बैलगाड़ी में भर कर घर भेजा गया। तब से ही उस कुंड का नाम मोती कुंड पड़ गया।

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