ये बिजनेसमैन भारत के लाखों घरों में देंगे बिजली

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ये हैं मनोज भार्गव। अमेरिका के रईस भारतीयों में इनकी गिनती होती है। साल 2010 से पहले कम लोग ही उन्हें जानते थे। 2012 में फोर्ब्स मैगजीन ने करोड़पतियों की लिस्ट में उनका नाम शामिल किया तब सबकी निगाहें उनकी तरफ गईं। मनोज को उत्तराखंड से बेहद लगाव है। अपना बिजनेस शुरू करने से पहले वह यहां के कई मठों में साधु की तरह रहे और दिल्ली के हंसलोक आश्रम में करीब 12 साल तक रहे।

मनोज के बारे में बात करें तो उनका जन्म 1952 में लखनऊ में हुआ। जब उनके पिता 1967 में अमेरिका में पीएचडी करने गए तो उन्हें साथ ले गए। मनोज पढ़ने में तेज थे, लेकिन उन्होंने पढ़ाई से ज्यादा अपने सपनों को साकार करना सही समझा। उन्होंने अमेरिका के मशहूर प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में गणित में ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन लिया, लेकिन पहले साल पढ़ाई करने के बाद यूनिवर्सिटी छोड़ दी। अब मनोज ने लाखों घरों में फ्री बिजली देने का फैसला लिया है।

MANOJ BHARGAVA2Image Source: http://media.treehugger.com/

क्या है फ्री बिजली का प्रोजेक्ट-
मनोज द्वारा बनाई गई एक साइकिल में एक घंटे पैडल मारने से पूरे दिनभर घरेलू उपकरण चलाने लायक बिजली आसानी से मिल सकती है। जहां बिजली नहीं है वहां लोग इससे 25 एलईडी बल्ब जला सकते हैं। सेलफोन चार्ज कर सकते हैं। छोटा पंखा चला सकते हैं। मनोज भार्गव की प्रयोगशाला ने 2015 में मेकैनिकल एनर्जी को इलेक्ट्रिकल एनर्जी में बदलने पर काम शुरू किया है।

साइकिल से बिजली बनने की तकनीक का उपयोग अभी तक सिर्फ साइकिल की लाइट जलाने तक ही सीमित रहा है, लेकिन मनोज ने इस तकनीक को विकसित करके भारत के उन घरों को रोशन करने का जिम्मा उठाया है जो आज भी बिजली से महरूम हैं। अमेरिका के एनर्जी ड्रिंक व्यापारी मनोज भार्गव ने साइकिल पर आधारित एक मशीन तैयार की है। इसे कसरत करने वाली साइकिल भी कहा जा सकता है। भार्गव की इस मशीन से साइकिल से बिजली पैदा की जा सकती है। मेकैनिकल एनर्जी को इलेक्ट्रिकल एनर्जी में बदलने की एक मशीन से एनर्जी को इकट्ठा किया जा सकता है और पूरे 24 घंटे इससे घर में बिजली रह सकती है।

MANOJ BHARGAVA1Image Source: http://news.nationalgeographic.com/

क्यों है इस प्रोजेक्ट की जरूरत –
अभी भारत के 32000 से ज्यादा गांवों में बिजली नहीं है। 10 लाख से ज्यादा परिवार अंधेरे में रहते हैं। मनोज द्वारा बनाई गई एक साइकिल की कीमत 12,000 रुपए के करीब रहेगी। पहले चरण में उत्तराखंड में इस पर काम होगा।

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