तत्काल टिकट बुक कराने वाले दलालों की मुश्किलें बढ़ीं

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भारतीय रेल में यात्रा करने के लिए लाखों की संख्या में लोग रोजाना टिकट बुक करवाते हैं। जिन लोगों को रिजर्वेशन में टिकट नहीं मिल पाता है वो लोग तत्काल सेवा का इस्तेमाल कर अपनी सीट पक्की करवा लेते हैं, लेकिन तत्काल में टिकट लेना बेहद ही मुश्किल काम है क्योंकि इस सेवा पर दलालों की मजबूत पकड़ होती है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) ने अपनी इस सेवा के लिए नई प्रणाली को जोड़ा है। जिससे दलालों के चंगुल से यात्रियों को बचाया जा सके।

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जानकारी के मुताबिक आईआरटीसी की वेबसाइट पर होने वाली टिकट बुकिंग की समस्या को रोकने के लिए कुछ उपाय किए गए हैं। दरअसल टिकट बुकिंग करने वाले दलाल कई गैरकानूनी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके तेजी से बुकिंग करते हैं। इसी प्रक्रिया को रोकने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। साइट पर अब बुकिंग करने वाले यूजर्स को करीब 35 सेंकड का इंतजार करना होगा। पहले यह अवधि दस मिनट थी। ज्यादा समय होने के कारण साइबर अटैक का खतरा बना रहता था।

अब कम से कम दो टिकट की बुकिंग के लिए 35 सेकेंड का इंतजार यूजर्स को करना ही होगा। इस अवधि को कम किए जाने से अन्य सॉफटवेयर जो तेजी से बुकिंग करते हैं उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। ऐसे में यात्रा करने के लिए जरूरतमंद यात्रियों को यह सेवा आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।

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इस प्रक्रिया के शुरू होने से गलत तरीकों से टिकट बुक करने वाले दलालों पर भी अंकुश लगेगा। इस प्रक्रिया के तहत अब कंप्यूटर पर नंबर और अंग्रेजी के अक्षर की एक सीरीज, जिसका इस्तेमाल आदमी और कंप्यूटर की पहचान करने में होता है और जिसे CAPTCHA कहा जाता है, उसे तीन बार एंटर करना होगा। इसको पहली बार लॉग इन करते समय और दूसरी बार रिजर्वेशन के समय, जबकि तीसरी बार टिकट की राशि के भुगतान के समय कंप्यूटर पर दर्ज करना होगा।

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रेलवे के मुताबिक हर रोज तत्काल सेवा से लगभग दो लाख लोग अपना टिकट बुक करवाते हैं। आईआरसीटीसी की ओर से श्रेणी के आधार पर इस सेवा को इस्तेमाल करने के समय का विभाजन किया गया है। इसके मुताबिक वातानुकूलित श्रेणी के टिकट की बुकिंग के लिए सुबह दस से ग्यारह का समय और सामान्य श्रेणी के लिए सुबह ग्यारह से बारह बजे का समय निर्धारित किया गया है। रेलवे में ऑनलाइन टिकट की बुकिंग का आंकड़ा कुल टिकटों का 58 फीसदी तक पहुंच गया है। इस सिस्टम को दलालों से बचाने के लिए विभाग की ओर से करीब 180 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

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