आखिर कब बदलेगा हमारा समाज?

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आज हमारा देश विकास के पथ पर सरपट दौड़ रहा है, दुनिया की रफ्तार के साथ कदमताल करने को देश तो बेताब है लेकिन समाज की जड़ों में गहराई तक अपनी पकड़ बनाए बैठी रूढ़ीवादी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है, जिसके चलते दुनियाभर में देश की छवि सुधारने की सारी कोशिशें सफेद हाथी की तरह साबित हो रही है।

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हलांकि काफी कुछ बदल गया है पर नही बदी तो हमारे समाज की नाकारात्मक सोच, जो आज भी वही पुरानी रूढ़ीवादी विचारों का लबादा ओढ़े बोझ ढो रही है। कहने को तो हमारे संविधान में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार है, सविधान में प्रावधान है कि ना तो कोई बड़ा है न छोटा, जाति-धर्म का कोई बंधन नहीं है, यहां पर सभी धर्मों का समान आदर किया जाता है। तो फिर जात-पांत या फिर ऊंच नीच का भेदभाव क्यों ?

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समाज में आखिर तथा-कथित छोटी और बड़ी जाति का भेदभाव क्यों। आज भी उन्हें समाज में गिरी नज़रों से क्यों देखा जाता है। कहने के लिए समाज में बदलाव तो आया है पर लोगों की सोच नहीं बदली है…अगर मोटे तौर पर देखें तो हमारा समाज दो भागों में बंटा है, एक वो जो गंदगी फैलानें में कोई परहेज नहीं करते हैं तो दूसरा ऐसा भी दबा कुचला वर्ग है जो हमारी फैलाई गदंगी को साफ करते हैं।

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ऐसा ही एक सामाजिक कलंक है…समाज की एक मैला ढोने की कुप्रथा, हलां कि सरकार ने इस सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए कई कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी आज भी गाहे बगाहे सदियों पुराना सामाजिक कलंक सुनने को मिल ही जाता है, जहां पर दूसरों की गदंगी को हांथ से उठाकर सिर रख कर पेट पालने के लिए लोग मजबूर हैं।

आखिर कब बदलेगा हमारा समाज 3Image Source: https://i2.wp.com

सरकार ने इस सामाजिक कलंक को समूल नष्ट करने के लिए इनके पुनर्वास की कई योजनाये भी बनाईं, पर गरीबी बेरोज़गारी और समाज की ओछी सोच से उस घर की युवा पीढ़ी के सामने रोड़े अटक जाते हैं। तो समाज उसे उसकी जाति का एहसास करा कर सामाजिक बोड़ियों में जकड़ देता है। लाख कोशिशों के बाद अगर इस समाज के युवा अगर आगे बढ़ने की कोशिश करता भी है जो समाज उसे लाकर जमीन पर पटक देता है। ऐसे ही एक महिला जो आज दिल्ली के शिक्षा संस्थान में प्रध्यापिका होने के साथ साथ एक अच्छी समाज सेविका भी है। वो अपने खट्टे-मीठे अनुभव के बारे में बताती है कि उन्हें अपनी मंजिल तक पहुचनें में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

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पढाई के समय सीट का अलग होना, पीने के पानी से दूर रखना, और हमेशा बहिष्कृत किया जान, कई बार तो मनोबल को तोड़ देता था, लेकिन भले ही उन्होंने समाज का दुख दर्द झेला पर आज वो अपने मुकाम पर मज़बूती से खड़ी हैं और समाज के सामने एक मिसाल हैं….और खुद भी समाज के दबे कुचले लोगों की सेवा कर रही हैं…हैं।

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