जानें भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों के अधूरे होने का राज क्या है?

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जगन्नाथ धाम की यात्रा के लिए हजारों श्रृद्धालु हर रोज उनके द्वार पर दर्शन करने पहुंचते है। जहां पर भगवान कृष्ण के साथ बलराम और सुभद्रा के साक्षात् रूप में बनी मूर्ति के दर्शन होते है। लेकिन जगन्नाथ में स्थापित तीनों ही मूर्तियों के दर्शन करने के बाद सभी के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों है।
आइये आज हम आपको बता रहे है। जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरे रहने का राज!

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जगन्नाथ मन्दिर में विराजमान भगवान की मूर्ति के अधूरे बने रहने के रहस्य इस कहानी से जुड़ा है। एक बार जब भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका में उनकी माता यशोदा, देवकी जी के साथ उनकी बहन सुभद्रा कुछ समय व्यतीत करने के लिए आयी। वहां पर पहुंचने के बाद श्री कृष्ण की सभी पत्नियों ने एक साथ मिलकर अपने पति की बाल-लीलाओं को जानने की इच्छा प्रकट की।
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उनकी माताओं ने अपने बच्चों की बाल-लीलाओं को बताने से पहले सुभद्रा को दरवाजें के पास पहरा देने के लिए बैठा दिया, जिससे कृष्ण और बलराम उनकी बातों को कहीं कोई सुन न लें। जब माताओं ने उनके बारें में बाते बताना शुरू कि तो सभी रानियां बेसुध होकर भगवान कृष्ण की लीलाओं का आनन्द लेने लगी और वे सभी उनकी लीलाओं में इतनी मंत्रमुग्ध हो गई कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब श्री कृष्ण और बलराम वहां पर आकर अपनी बातों को सुनने लगें। कहते है कि जिस समय वो लीलाओ को सुन रहे थे, उस समय अपनी लीलाओ को सुनने में इतना खो गए कि उनके शरीर के बाल सीधे खड़े हो गए और उनकी आंखे बड़ी-बड़ी विशाल सी बन गई। उनका पूरा शरीर प्रेम तथा भक्ति में डूबकर पीघलने लगा। खुद सुभद्रा भी भक्तिमय वातावरण आकर पीघलने लगी तभी से जगन्नाथ मंदिर में भी उनका शरीर सबसे छोटा ही दिखता है। इस वातावरण को भंग करने के लिए नारद मुनि पहुंचे और सभी लोगों का उस जगह से ध्यान भंग किया। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण और बलराम के साथ सुभद्रा के इस रूप को देख नारद मुनि भी मन्त्र मुग्ध हो गए और इसी सुंदर रूप के साथ धरती पर आने का अनुग्रह करने लगें। तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि कलियुग में मेरा अवतार ऐसा ही होगा।

नारद मुनि को दिए वचन को पूरा करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने राजा इन्द्रद्युम्न को सपने में आकर पुरी पर उनकी मूर्ति को स्थापित करने की बारे में बताया। राजा ने तुंरत उनके कहे आदेशानुसार मंदिर का निर्माण करने के लिए योग्य कारीगर की तलाश की जाने लगी। तब ही वहां एक बूढ़े ब्राह्मण ने पहुंचकर राजा से स्वंय मंदिर का काम करने हेतु अनुमति मांग ली और इसके साथ ही मंदिर के अंदर मूर्ति स्थापित करवाने की बात पर भी स्वीकृति ले ली।लेकिन मंदिर के निर्माण कार्य को करने हेतु उस कारीगर ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी कि वह अपने सभी कार्य एक बंद कमरे में ही करेगा और यदि कार्य के करते वक्त कमरा खोला गया तो वह बीच में ही छोड़कर चला जाएगा।

राजा ने उस ब्राह्मण की बात स्वीकार करते हुए शर्त मान ली और बाहर से कमरे को बंद करवा दिया, लेकिन काम की देखरेख करने के लिए राजा उस कमरे के आसपास घुमने चले जाते थे। जब बंद कमरे में काम करने की अवाजें अचानक आना बदं हो गई तो राजा को इस बात की चिंता सताने लगी कि काम कैसे रूक गया। कही बूढ़ें इंसान को कुछ हो तो नहीं गया। इस बात को परखने के लिये उन्होंने झट से दरवाजा खोल दिया और ब्राहमण आधूरा काम छोड़ अतंर्ध्यान हो गया। वास्तव में वह बूढा ब्राह्मण और कोई नहीं खुद विश्वकर्मा जी थे, जो भगवान विष्णु के रहने पर यह जगन्नाथ मंदिर में कृष्णा, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां को बनाने धरती पर उतरे थे।

कहां जाता है कि विश्वकर्मा जी अपने सभी निर्माणकार्य एक रात में पूरा कर देते थे सुबह होते ही वो उस काम को वही छोड़ देते थे और इस मंदिर की मूर्ति के साथ मंदिर का निर्माण कार्य भी विश्वकर्माजी ने एक ही रात का समय निर्धारित किया था। अधूरे छोड़ने का सबसे बड़ा कारण यह भी था कि कोई भी देवता नहीं चाहते थे कि भगवान के इस वास्तविक रूप को कोई साधारण इंसान देख सके। इसलिए सूर्योदय से पहले वो इस काम में बाधा डालने के लिए राजा को माध्यम बनाकर भेज दिया गया और जगन्नाथ की मूर्तियां वैसी ही अधूरी रह गई और अधूरी ही स्थापित की गई। जिसे आज तक पूरा नहीं किया जा सका।

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