विकसित होते इस देश में लोग खाने को मजबूर हैं घास की रोटी

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बुंदेलखंड के दुर्भाग्य ने पूरे देश की तस्वीर बदल डाली है। हमारा देश विकास के पथ पर भले ही तेजी से अग्रसर हो रहा है पर यहां के किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। देश की राजनीति के दांव पेच के बीच किसान ही पिस रहे हैं। सूखे से ग्रस्त किसान या तो आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं या फिर भूखे पेट अपने साथ बच्चों को सुला रहे हैं। कई क्षेत्रों के हालात तो ये बने हुए हैं कि किसानों को एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। घास की रोटी खाकर वह अपना जीवन जीने को मजबूर हैं।

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आज हमारा देश दूसरे देशों के साथ कंधे से कधा मिलाकर चलने की बात कर रहा है, पर देश के मजबूत कंधे अपने ही लोगों का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। आज देश के कई क्षेत्रों के हालात ये हैं कि बाढ़ और सूखे से परेशान कुछ गांव अपने हालात पर रो रहे हैं। बच्चे पढ़ाई के लिए तो दूर एक वक्त के भोजन तक के लिए तरस रहे हैं। उत्तर प्रदेश के 75 में से 50 जिले आधिकारिक रूप से ‘सूखाग्रस्त’ घोषित किए जा चुके हैं और ऐसा ही एक इलाका है बुंदेलखंड। जहां के लालवाड़ी गांव में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोग वे सब कुछ खाने और अपने बच्चों को खिलाने के लिए मजबूर हैं जो आमतौर पर वे अपने जानवरों को खिलाया करते हैं यानी कि घासफूस।

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स्थानीय भाषा में ‘फिकारा’ कही जाने वाली इस सूखी घास का गुच्छा लालवाड़ी के निवासी कीचड़ में से ढूंढकर निकालते हैं और उसके अंदर के बीजों को पीसकर उसका आटा तैयार करते हैं। हरी घास की सब्जी बनाकर उसके साथ उस बीज से पिसी रोटी को खाते है। आमतौर पर ये घास पालतू जानवरों को खिलायी जाती है, लेकिन अब इनके पास कोई चारा नहीं है तो खुद भी यही खाने के लिए मजबूर हैं।

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यहां सूखे के बाद से भुखमरी और कुपोषण के हालात हैं। 108 गांवों में कराए गए सर्वे के मुताबिक बुंदेलखंड में पिछले 8 महीने में 53 फीसदी गरीब परिवारों को दाल तक नसीब नहीं हुई है। 69 फीसदी लोगों ने दूध नहीं पिया। हर पांचवां परिवार हफ्ते में कम से कम एक दिन भूखा सोता है। 38 फीसदी गांवों में भूख से मौतें हुई हैं। 17 फीसदी परिवारों ने घास की रोटी (फिकारा) खाने की बात कुबूली। मार्च के बाद अब तक 40 फीसदी परिवारों ने अपने पशु बेच दिए। 27 फीसदी ने जमीन बेच दी या फिर रुपयों के लिए गिरवी रख दी।

एक तरफ हमारी सरकार बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए ना जाने कितनी योजनाएं तैयार कर रही है, पर भूख से तिलमिलाते बच्चों के पेट यदि खाली होंगे तो वो ज्ञान किस प्रकार से अर्जित कर सकते हैं। अपने पेट को भरने के लिए इन बच्चों को खुद भी अपने मां-बाप के साथ काम पर जाना पढ़ता है। तब कहीं जाकर इन्हें एक वक्त का खाना नसीब होता है। ये हालात हैं हमारे देश के जहां पर हर तरफ गरीबी है, जो सरकार से कह रही है कि हम भूखे किसानों की अवाज को इन योजनाओं से मत दबाओ।

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अस्थायी तौर पर राज्य सरकार को ललितपुर (लालवाड़ी इसी जिले में है) जैसे सभी सूखाग्रस्त जिलों में एक समान सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू कर देनी चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि राज्य यह या इस तरह का कोई भी आपातकालीन कदम उठा रही है।

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