जब एक सैनिक को काटनी पड़ गई अपनी टांग

आपने फौज व जंग से संबंधी किस्से तो कई सुने होंगे। ये किस्से सुनकर जहां देश के सैनिकों के प्रति सम्मान और ज्यादा बढ़ जाता है वहीं इसके साथ ही यह भी समझ आता है कि एक सैनिक का जीवन कितना कठिन होता है। आज हम आपको एक ऐसे ही सैनिक की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिसे देश की रक्षा करने के लिए अपनी टांग तक काटनी पड़ी।

यह कहानी जांबाज इयान कारदोजो की है। वो उस समय सेना में पांचवीं गोरखा राइफल्स के मेजर जनरल थे। सन् 1965 तथा 1971 में भारत की तरफ से हुए हर युद्ध में इन्होंने हिस्सा लिया और बड़ी ही बहादुरी से सभी दुश्मनों के साथ लोहा लिया, लेकिन 1971 की एक जंग इयान कारदोजो के लिए एक बहुत ही अहम लड़ाई साबित हुई। जिसने उनका पूरा जीवन ही बदल दिया।

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किसी पाकिस्तानी का खून नहीं लिया

1971 में जब भारतीय सेना पाकिस्तान से साथ हेली में युद्ध लड़ रही थी उसी दौरान इयान कारदोजो का पैर एक लैंडमाइन पर पड़ गया जिसके कारण एक धमाका हो गया। उस धमाके में ये ही माना जा रहा था कि इयान कारदोजो नहीं बचे होंगे, लेकिन ईश्वर को शायद कुछ और ही मंजूर था। इस युद्ध के बाद जब एक रहवासी ने उन्हें देखा तो वो उन्हें उठा कर सीधे पाकिस्तानी बटालियन के मुख्यालय में ले गया। वहां जब डॉक्टर ने उन्हें देखा तो वो स्वयं ही डॉक्टर से मॉरफीन मांगने लगे, लेकिन जब उन्हें मॉरफीन नहीं मिला तो उन्होंने एक धारदार चाकू मांगा और वहां मौजूद एक गोरखा को अपनी टांग काटने को कहा। जब गोरखा यह सुन कर घबरा गया तो उन्होंने स्वयं ही अपनी टांग काट डाली।

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इसके बाद वहा मौजूद एक पाकिस्तानी डॉक्टर ने उनका ऑपरेशन किया। टांग काटने के कारण उनके शरीर में खून की कमी हो गई थी। जिसके बाद उनके शरीर को खून की जरूरत थी। जब उन्हें खून चढ़ाया जाने लगा तो उन्होंने पाकिस्तान के किसी भी शख्स का खून चढ़ाने से मना कर दिया।

उनके इस जज्बे को सभी सलाम करते हैं। आज भी बांग्लादेश में उनके नाम पर एक फुट बाय एक फुट की जमीन है। इस जमीन में उनकी कटी हुई टांग को दबाया गया है। इयान कारदोजो एक ऐसे सैनिक थे जिन्होंने एक टांग खोने के बाद भी काफी समय तक ब्रिगेड का नेतृत्व किया था।

सेना में कारतूस साब के नाम से जाने जाते थे

घर हो या स्कूल हर जगह किसी ना किसी का एक उपनाम जरूर रखा जाता है। कुछ इसी तरह सेना में भी सैनिकों को उपनाम दिए जाते हैं तथा इयान करदोजो को भी उनके साथी कारतूस साब के नाम से पुकारते थे। यह नाम उन्हें कैसे मिला इसकी कहानी भी बहुत दिलचस्प है।

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सिलहट की लड़ाई के समय जब वो किसी तरह सेना के आखिरी हेलिकॉप्टर की मदद से युद्धक्षेत्र में पहुंचे थे तो उन्होंने देखा कि उनकी बटालियन के सैनिक उन्हें खोज रहे हैं। जैसे ही उन्होंने इयान करदोजो को देखा तो सभी सैनिकों ने उन्हें कंधे पर उठा लिया और जोर-जोर से गाने लगे “कारतूस साब होयकि हैना कारतूस साब होयकि हैना।” यह सभी वो सैनिक थे जिन्होंने 65 के युद्ध में उनका साथ दिया था।

इयान करदोजो का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के अवॉर्ड जीते हैं तथा कई सारे सेना के मेडल भी हासिल किए हैं, लेकिन उनके साथियों व गोरखा सैनिकों ने उन्हें जो सम्मान दिया था वो उनके लिए अद्वितीय है। कारतूस साब आज बहुत बूढ़े हो चुके हैं, लेकिन उनके दिल में आज भी देशभक्ति कूट-कूट कर भरी है।

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